A source of BJP power.

April 21st, 2022

PART I.

जैसे जैसे इस देश में चीजें और ज्यादा घिनौनी और वेह्शियना होती जा रही हैं, इस घिनोने समाज और राजनीति के पीछे की कुछ सचाई बाहरी रूप के पीछे छुपती जा रही हैं. यह की, 2014 में बीजेपी के जीतने का एक बड़ा कारन (शायद सबसे बड़ा काऱण) बड़े उतयोगपति और अरबपति वर्ग की फंडिंग, और उनके न्यूज़ नेटवर्क का बीजेपी को समर्थन था.

यह की, इस उद्योगपति और अरबपति वर्ग को कुश रख कर ही यह पार्टी ताकत बनाए हुए है. अरबपतियों और बड़े उद्योगों के लिए टैक्स माफ़ी, ‘इज़ ऑफ़ डूइंग बिसनेस्स’ के नाम पर कानून खोखले करना, मजदूर वर्ग की बची कुछ ताकत को भी कुचल देने वाले नए श्रम कानून लागु करना, वगेरा वगेरा।

यह अरबपति वर्ग और बीजेपी की सांठगांठ के आलावा हिंदुत्व संगठनो और अरबपति वर्ग का एक और आम उदेश है: माइनॉरिटी और गरीबों के लिए बानी पोलिसिओं को हटाना, ताकि सरकार की जगह कम्पनिया ले सकें मुनाफे के लिए. जब हिंदुत्व संगठन नेहरू पर कीचड़ उछालते है तब वो इस देश के अरबपति वर्ग को बड़ी ख़ुशी देता है, क्यंकि वो कीचड एक ऐसी आर्थिक विवस्था जो गैर-बराबरी काम करने की कोशिश करती है और कंपनियों पर सामाजिक न्याय के चलते कुछ रोक लगाती है, उस विचार पर भी वो कीचड़ गिरती है.

हम संविधान को चाहे कितनी भी बार सीधा पढ़ लें या उल्टा करके, ये पैसे और राजनैतिक ताकत की सचाई है, जिसको आज की उथल-पुथल में याद रखना ज़रूरी है. जबतक अरबपति वर्ग को ये सरकार खुश रखेगी, उनको और अमीर बनाती रहेगी, और ताकत देती रहेगी, और लोगों को आर्थिक मुद्दों से दूर रखेगी, तब तक इसका ही राज रहेगा.

यह भी सच है की यह इस्थिति बनी ही इस्सलिये थी क्योंकि जादातर मुद्दे जो काम करने वाले वर्ग के जीवन पर असर डालते है उन् पर बात करना बंद कर दी गई थी, क्योंकि वो कंपनियों को, उनके न्यूज़ चैनल्स को पसंद नहीं. तो ऐसे में ये कोई चौकाने वाली बात नहीं है की जब सारी राजनैतिक पार्टिया जनता को आर्थिक मुद्दे से दूर रखना चाहती है थो पेचान की राजनीति में सबसे कट्टर पहचान की राजनीति करने वाली पार्टी की सबसे आगे रहेगी.

कश्मीर फाइल्स & लिबरल

March 20th, 2022
कश्मीर फाइल्स की रिलीज से जो भारत के समाज की – खासकर हिन्दू समाज के कुछ वर्गों की – जो नफरत सामने आ रही है वो आज नहीं पैदा हुई है. ना ही वो 2014 में पैदा हुई. 2017 के एक नेशनल सर्वे में सिर्फ 8% भारतियों ने यह कहा था की कश्मीर में मिलिट्री ज़ोर का इस्तेमाल कम किया जाना चाहिए, और लगभग 70% भारतियों ने कहाँ था की भारत की सेना को और ज़ादा बल और हिंसा का इस्तेमाल करना चाहिए. ये पुलवामा के पहले और बुरहान वानी की मौत के 2 साल बाद की बात है – जब भारत की सेना पेलेट गन का इस्तेमाल आम जनता पर कर रही थी. याद रखने वाली बात है की पेलेट गन का इस्तेमाल 2010 से कांग्रेस सर्कार द्वारा शुरू करा गया था.
उस ही सर्वे में ये भी पता चला की भारत के लोगो से जब पूछा गया की देश को बेहतर बनाने में कोनसे संसथान का सबसे ज़ादा योगदान है तो कोर्ट, पुलिस, सर्कार, एन.जी.ओ अदि से काफी ऊपर मिलिट्री अति है. हिंसा, मिलिटरीवाद, और कश्मीर के लोगो से दुरी और कई लोगो की नफरत आज की बात नहीं है और इसकी जड़ हिन्दुत्बा से गहरी जाती है – बल्कि “लिबरल” लोगो में भी आसानी से मिल जाती है.
क्यों 1990 से 2014 के बीच “लिबरल” भारत के और लोगों के बीच मिलिट्री और कश्मीर में हिंसा के बारे में लोगो की चेतना में बदलाव नहीं ला सके? क्या पता आने वाले दिनों में भी आम लोगो के बीच इन मुददों पर संघटित तरीके से लोगों की चेतना बदलने का काम कर पाएंगे या नहीं.
जादातर लोगों की सामाजिक चेतना लेक्चर हॉल और सेमिनार में नहीं बनती – जहाँ पहले से पढ़े लिखे और शोध में समय दे सकने वाले लोग आते हैं. रोज़मर्रा के सघर्षो, यूनियन गतिविधियों और कुछ गैर राजनैतिक प्लेटफॉर्म्स में ही लोगो के साथ इन मुददों पर समज विकसित करने का काम किया जा सकता है. जो की वो सभी लोग, जो समाज में गैरबराबरी और हिंसा का राज चाहते है, बखूबी कर रहे है.
नए इंस्टाग्राम लेफ़्टिस्ट्स में से कई लोगों का तो ये मानना है की जो लोग दुनिया में उनके जैसी सोच ले कर नहीं गिरे वो सब उनके दुश्मन है. जिसका मतलब जादातर मजदूर वर्ग भी क्यंकि उनमे से कुछ लोग भगवा स्कार्फ़ और माथे पर टिका लगा कर घूमने लगे है. जबकि ये दोनों बर्ताव एक ही सिक्के के दो पहलु है – अपने आप को एक नैतिक दृष्टि के गुट के हिस्से के रूप में दिखाना. जबतक हम इन लोगो से बात नहीं करेंगे और इनको अपना हिस्सा नहीं मानेंगे तबतक इस्थिति सिर्फ बत्तर होनी है.

Indian missile drops accidentally in Pakistan

March 13th, 2022
I wonder how Indian media and establishment would have reacted if a Pakistani super-sonic cruise missile would have entered Indian airspace and landed in Haryana. (To the best of my knowledge Pakistan has none.)
Most likely this was a BrahMos cruise missile first tested in 2020 in Andamans. This is a ‘fire-and-forget’ missile that cannot be launched without locking in on a fixed target. Which raises the question of why was a missile locked in on Pakistan during peacetime?
And even if there is no wish to escalate tensions on either side this incident should remind us that at the end of the day these killing machines are Machines that fail. And if this happens in a time of escalated tensions on the border or diplomatically the results would definitely be catastrophic for all.
This incident should make us demand demilitarization, resuming peace talks with Pakistan, and at least demilitarization of Kashmir – the first step towards a peaceful solution.

अरबपति वर्ग की तरफ से भारत को नए साल की शुभकामनाएँ

January 4th, 2022

पिछले हफ्ते कुछ अखबारों ने बड़ी खुशी से ये खबर दी की भारत में डॉलर अरबपति की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है. 2021, का साल जो दुनियाभर के ज्यादातर लोगों के लिए एक खौफनाक वक्त था उस साल भारत में 40 नए अरबपति बने.अब इस देश में 126 डॉलर अरबपति है. इन् 126 लोगों की पूँजी मिला कर रु.55 लाख करोड़ की है. इसका मतलब है की इन 126 लोगों के पास इस देश के 80 लाख परिवारों की कुल सम्पति से ज़्यादा सम्पति है.

यह उस 2021 के आंकड़े है जिस साल इस देश में पहले कभी ना देखी गई तेजी से लोगों ने लम्बे समय नौकरी ना मिलने के बाद नौकरी खोजना ही बंद कर दिया। और यह सिर्फ कोरोना महामारी और उसके आर्थिक असर के कारन नहीं है. 2016 से लगातार इस देश में लोग नौकरी मिलने की उम्मीद छोर कर बाजार से बहार जा रहे है. जिसका एक असर यह है की भारत के ज्यादातर परिवारों में एक से अधिक सदस्य के पास रोज़गार नहीं है. 2016 में सिर्फ 34% परिवार थे जिनमे एक से ज़्यादा लोगो के पास काम था. 2021 में यह संख्या 24% हो गई है. 2020 के लॉकडाउन के दौरान यह 17% थी.

तो जिस समय इस देश के ज्यादातर परिवार भुखमरी के करीब जा रहे है उस ही समय कुछ मुट्ठी भर लोग इस देश की पूरी सम्पति अपने पास समेत रहे है.

यह 126 डॉलर अरबपति वर्ग में सबसे ऊपर है मुकेश अम्बानी. मुकेश अम्बानी ने पिछले साल हर एक मिनट रु. 2 लाख अपनी सम्पति में जोड़े. जो हम में से ज्यादातर लोगों को जोड़ने में कम से कम 2 साल लगेगा.

फेयरवर्क इंडिया की नाई रिपोर्ट के अनुसार 2021 में ज्यादातर सामान और खाना डिलीवरी वर्कर्स की आमदनी में गिरावट आई है, पेट्रोल के दाम में बढ़ोत्तरी और कंपनी के कमीशन भड़ने की वजह से.

रिपोर्ट ने यह भी बताया की हर एक डिलीवरी कंपनी अपने मजदूरों को एकजुट हो कर अपनी बात रखने से रोकने के लिए बहुत मेहनत कर रही है. उनका एक बडा मकसद यूनियन ना बनने देना है. बॉस वर्ग यह बात जानता है की एक कर्मचारी एक बड़ी कंपनी के सामने मोहताज और बेबस है.

लेकिन बॉस वर्ग और बॉस वर्ग में भी अरबपति वर्ग आपस में एकजुट है और रोज़ इस देश को लूटने की मशक्कत कर रहा है. और इसका अंजाम हम अपने आसपास की गरीबी, बेबसी और ना-उम्मीदी में देख रहे है.

गैरबराबरी से परेशानी क्या है?

December 28th, 2021

भारत में रह रहे 50% परिवारों के पास औसत तौर पर Rs.66,000 की पूंजी है – जो एक बड़ा झटका आने पर परिवार को सड़क पर ले आता है. इस देश के सबसे अमीर 10% लोगों के पास इस देश की 65% संपत्ति है – और उनमें से भी सबसे अमीर 1% लोगों के पास देश की संपत्ति का 33% हिस्सा है.

समाज की संपत्ति के बंटवारे में गैरबराबरी सिर्फ ग़रीब, मज़दूर, मध्यम वर्ग और अमीर “बोस” कॉर्पोरेट वर्ग के बीच ही नहीं है – ये जाती की बुनियाद पर भी बटी है. हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के हिसाब से इस देश के 50% अनुसूचित जनजाति से लोग गरीबी रेखा के नीचे है, ये आंकड़ा अनुसूचित जाती के लिए 33.3% है और पिछड़ा वर्ग के लिए 27.2% है. जबकि देश की बची हुई जनसंख्या में 15.6% लोग गरीबी रेखा के नीचे है. ये साफ़ है की इस देश में अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाती बेहद मार खाई हुई है उस समय जब की देश में हर जाती और धर्म के लोग गैरबराबरी और गरीबी से ग्रस्त है.

यह हकीकत के बावजूद अक्सर लोगो से सुना है की लेकिन वो मेहनत करते है तो अमीर है, वो तेज़ दिमाग है, वग़ैरा-वगेरा. इस हालात को बनाए रखने के लिए जो चीज़े हमें सिखाई गई है उन्हें दोहराते है.

लेकिन ये 10% और 1% सबसे अमीर लोग इतनी पूंजी का क्या करते है? घर में गेहूं चावल भर कर रख लेते है? फ्रिज ख़रीद लेते है? सबसे महंगी कार और हवाईजहाज खरीदने के बावजूद इस वर्ग के पैसे में कमी नहीं आती तो फिर ये पूँजी का क्या होता है?

इस सम्पति से मिलती है राजनीतिक ताकत। खरीदते है समाज के संसाधन – कॉलेज, पानी, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, बिजली उत्पाद करने वाले बिजली घर. साफ़ लफ़्ज़ों में कहें तो ये देश को खरीदते है.

आप में से अगर किसी को लोकतंत्र शब्द सुना सुना लग रहा हो तो गुज़ारिश करूँगा की सोचने की कोशिश करें की ऐसे हालात में लोकतंत्र की क्या इस्थिति हो सकती है – याद दिला दूँ की इस देश में राजनैतिक पार्टियों को कॉर्पोरेट्स बिना हिसाब पैसा दे सकते है.

यह भी याद दिला दूँ की ये 10% और 1% का वही अमीर वर्ग की है जिनकी कार और मॉल के लिए आज के शहर बने है, यह वही वर्ग है जो इस देश के कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है. ये लूट है. ये खून है. ये गैरबराबरी है.

 

 

 

 

Hierarchy of Professional Ethics in Civil Engineering

December 13th, 2021

The Preamble of the ASCE Code of Ethics reads: “Members of The American Society of Civil Engineers conduct themselves with integrity and professionalism, and above all else protect and advance the health, safety, and welfare of the public through the practice of Civil Engineering.”

 

The new-old boogies of oil and gas industry

December 7th, 2021

World Petroleum Congress was held in Houston, Texas on 06.12.2021. Where “executives from Saudi Aramco, Exxon Mobil, and Chevron, speaking at the World Petroleum Congress in Houston on Monday, blamed demand for renewables and lack of investment in fossil fuels for recent fuel shortages and price volatility.”

The things that need more attention according to the oil and gas giants are “”Energy security, economic development and affordability are clearly not receiving enough attention.” Energy security and economic development on a dead planet? The economic development of the last century – especially since the neoliberal period has been that of massive concentration of wealth and power and people losing access to essential energy needs. And the worry about affordability once again shows how the state and its subsidies and fundings are essentially what makes a technology, sector, or industry feasible under contemporary capitalism.

The industry is also raising the boogieman of inflation and social unrest. Which are not unlikely but not inevitable and both are guaranteed in a scenario where the world enters irreversible cascading climate collapse.

India Arms Production and Export Boost

December 7th, 2021

“Combined arms sales by the three Indian companies in the Top 100 grew by 1.7 per cent. In 2020 the Indian Government announced a phased ban on imports of certain types of military equipment to bolster self-reliance in arms production.” – SIPRI.

 

Some corporate-climate-green-washing myth busting.

December 7th, 2021

A new report by T&E shows that the new “green” hydrogen fuels – which are made by turning electricity into hydrogen which when combined with CO2 produces a liquid fuel similar to petrol or diesel – are as, or maybe more polluting than existing fossil fuels. But the oil and gas and the automobile industry is pushing hard for these fuels. India under Modi has initiated a National Hydrogen Mission which is supposed to be a major part of the net-zero effort. Although the sector is waiting for the policy document to come and “a strong regulatory framework to be created keeping the interest of investors in mind.”

The level of NOx pollutants is equal to conventional fuels while CO (carbon monoxide) toxic production was higher in e-fuel tests.

India will soon be responsible for 3rd of the world’s air conditioning demands given the rise in extreme heat events in the region. But the ability to purchase and make billing investments is within a very small section of the population – my educated guess would be that it is roughly equal to the population owning private cars, i.e. around 2% of the national population.

Once again the only hope out of this entangled situation is the state sector coming to help the market -agencies like Energy Efficiency Services Limited will have to produce cheaper and more efficient air conditioners for the masses.

Meanwhile, European Environmental Bureau released a report on the repairability and replaceability of batteries in consumer electronics. Most new electronic gadgets do not allow for repair or replaceability of batteries creating more pollution, waste, overproduction, and burden of costs.

AI can expedite democratization in construction industry

September 19th, 2021

Sam Dolgoff in a very important article The Relevance of Anarchism to Modern Society wrote that “[t]he progress of the new society will depend greatly upon the extent to which its self-governing units will be able to speed up direct communication — to understand each other’s problems and better coordinate activities.” That this is the case is illustrated by the application of Enterprise resource planning software at workers’ owned manufacturing plants:

“[T]his proved to be an effective communication strategy for the 100% employee-owned company, which relied heavily on teamwork and collaboration as part of its company culture.
Abbate is excited to see how streamlined, digital communication is being embraced by employees. For example, he tells the story of how an employee who did not want a computer on the shop floor is now providing constructive feedback on jobs using the digital information he now has at hand.
“The ERP system is a point of engagement on the shop floor — people are now talking the same language that we’ve been talking in the production meetings and scheduling. Our new communication system gives more opportunity to provide feedback.”
[T]he ultimate goal in streamlining communication was to provide transparent information to everybody.”

In the construction industry, Building Information Modeling (BIM) softwares have the potential for achieving the same goals. BIM software can design the works project, estimate the material required, store scheduling data, maintain inventory based on this data, and can be changed in real-time over the lifecycle of the project. Providing workers on-site with all the information needed for the day-to-day tasks and updating the project based on site activities.

On the other hand, new AI-based Optioneering programs allow the generation of multiple options for a project based on the needs. If a community requires ground connectivity from A to B within a city these programs can generate several options based on the geological and geographic data and the social and environmental decision-making criteria we input. Some projects might have smaller embodied carbon, while others might displace the least amount of informal settlements, while the third might just be the easiest and most profitable for the contractors. If the communities are allowed to become part of the options process and based on informed judgment in deciding the criteria for project selection then this technology has the potential for a genuine democratization of the construction industry. As mentioned in a previous post the pre-tender planning process is very crucial for the future of sustainable infrastructures. cities and life on the planet.