Caravan Magazine’s report on Indian armed forces’ silencing of journalists in Kashmir

May 2nd, 2020

 

कोरोना और क्रांतिकारी स्पेन की सीख

March 29th, 2020

1936 में स्पेन में जंग शुरू हुई, और जब मालिक और नेता अपने घर और फ़ैक्टरिया छोड़ भाग खड़े हुए तो मजदूरों ने उनपे कब्ज़ा करा और उन्हें चलाया. आधा स्पेन एक साल पूरी तरह मजदूरों के हाथ में था. फैक्ट्री, ट्रैन, खेत, यहाँ तक की बाल काटने वालो की दुकान सब मजदूरों के हाथ में थे. स्वास्थ व्यवस्था भी।

जादातर मजदुर वर्ग के लिए ये सेवाएं पहली बार खुली थी. बड़े शहरों में और हर गॉव में और यहाँ तक कि ऐसे इलाके जहा पर सिर्फ 2 या 3 घर थे वहां भी क्लीनिक खोले गए और स्वास्थ कर्मचारियों ने अपनी यूनियन के ज़रिये इन्हें संचालित करा. स्वास्थ एक निजी व्यवसाय से बदल के सामाजिक संगठन में तब्दील हो गया था।

लगभग हर इलाज मुफ्त था. जो कुछ ऑपरेशन्स का पैसा लिया जाता था वो यूनियन के पास जाता था. इस पैसे का क्या करना है इसका फैसला वर्कर्स खुद लेते थे. कुछ ही महीनो में बार्सिलोना शहर में 6 नए अस्पताल खोले गए.

इसके अलावा और भी आयामों में बदलाव आया. एक स्वास्थ्य कर्मचारी ने बाद में लिखा था की,

“वो बड़े डॉक्टर जो हफ्ते में एक बार अस्पताल में आया करते थे, उन्हें तख़्त से गिरा दिया है. वो नामी सफ़ेद सूट वाले हॉस्पिटल की गलियों में जिनके आगे पीछे 3-4 लोग गर्दन नीचे करके, उनके लिए सामान पकड़ कर चलते है, वो उच्च-नीच अब यहाँ इतिहास हो गई है. अब यहाँ सब साथी है और बराबर है”

वायरस: कोरोना और पूंजी

March 22nd, 2020

कोरोना वायरस से भारत में अब तक 4 लोगों की जान जा चुकी है – उनमे से 2 लोगों की जान इसलिये गई क्यंकि उन्हें प्राइवेट अस्पतालों ने भर्ती करने से मना कर दिया और वो भटक भटक कर हार गए. 17 मार्च को सरकारी मंत्रालयों ने प्राइवेट अस्पतालों से मुफ्त में कोरोना के जाँच करने का अनुरोध करा और प्राइवेट अस्पतालों के मालिकों ने मना कर दिया. प्राइवेट हस्पतालों में Rs. 5000 में जाँच हो रही है. भारत में स्वास्थ्य प्रणाली के नाम पर जादातर लोगों के लिए प्राइवेट बीमा ही उपलब्ध है. प्राइवेट बीमा कम्पनियों ने कहा है की अगर बीमा के कॉन्ट्रैक्ट में “महामारी” का ज़िक्र नहीं है तो कोरोना जाँच और इलाज के लिए पैसा नहीं मिलेगा. लेकिन उनका कहना है कि अगर कोई जीवन बीमा लेने के बाद कोरोना से मर जाए तो उसे हम पैसे ज़रूर देंगे.

लोगों की जान का ज़िम्मेदार, और लोगों की लड़ाई आज सिर्फ एक वायरस से नहीं है बल्कि जानलेवा पूंजीवाद से है. और पूंजीवाद के सिर्फ उस पक्ष से नहीं जिसके कारण एक स्वस्थ जीवन हमारा संवैधानिक और एक मौलिक मानव अधिकार भी हमें नहीं मिलता बल्कि, पूंजीवाद की जड़ से है जिसके कारण कोरोना आपदा से बड़ी आपदा इस देश और दुनिया में हमेशा बनी रहती है. ये आपदा आज नहीं आई है. ये हमारी आँखों के सामने शुरू से रही है और आगे भी लोगों की जान लेती रहेगी अगर हम मानव इतिहास के इस पल में भी न्यूनतम मानवता जगाने में असफल होते है तो.

लगभग 2 महीनो में कोरोना वायरस से भारत में 4 लोगों की जान गई. 2018 में 2080 लोगों की भारत में जलवायु आपदा के असर से जान जाने की रिपोर्ट है – हर महीने 175 मौत. कोरोना के कारण दुनिया भर में 3 महीनो में लगभग 10,000 लोगों की मौत हुई है. 2040 तक जलवायु आपदा के कारण कम से कम 4,50,000 की जान जाना तय है अगर जल्द ही ग्लोबल वार्मिंग को थामा नहीं गया तो. लेकिन इसको कैसे और क्यों रोका जाए जब 70% ग्लोबल वार्मिंग के लिए 100 बड़ी कंपनिया ज़िमेदार है? बिसनेस को नुक्सान ना हो इसलिए जनता का कर्फ्यू तक तो रविवार को रखा गया है – – ये 100 कंपनियों को नुकसान कैसे होने दें? मरते है 4 लाख लोग तो मरें.

जलवायु परिवर्तन जैसे संकट को पैदा करने के अलावा और भी रोज़मर्रा की आपदा पैदा करता है पूंजीवाद. भारत में हर साल लगभग 48,000 लोग काम पे मारे जाते है. ज़ादातक फैक्टरियों में और बिल्डिंग वगेरा बनाते समय मारे जाते है क्योंकि मजदूरों की सुरक्षा पे खर्चा अगर बढ़ेगा तो विदेशी कम्पनियाँ यहाँ पैसा नहीं लगाएगी. तो मरते है हर घंटे 6 मजदूर तो मरने दो – ये आपदा कोरोना जैसे अमीरो को नहीं लग सकती तो इसका टीवी पे क्यों ज़िक्र करें?

और कोरोना से ज्यादा घातक तो भारत में भारत की पुलिस है. हर साल पुलिस कस्टडी में 2000 लोग मारे जाते है – हर दिन 5! कोरोना को कुछ टिप्स दे सकती है भारत की पुलिस. और हर साल 100 से ज़ादा लोग भारत की फ़ौज की पाकिस्तान के गावों में शेल्लिंग से मारे जाते है – पाकिस्तान की शेल्लिंग से भारत में भी मारे जाते है, बेशक. लेकिन वो बेकसूर गाँव वालों ने ना पाकिस्तान को बोला था ना हिंदुस्तान को कि उनके आंगन में अपनी सरहद लेके आओ.

कोरोना पर वापस लौटते है. सरकार और हमारे देश की प्रणाली की क्या तैयारी है और कोरोना आपदा को रोकने में अब तक ये कितनी सफल रहे हैं? इस का फैसला करने के लिए पहले यह देखना होगा की ये किस प्रकार की आपदा है और ऐसी आपदा के लिए “अच्छी तैयारी” किसे माना जा सकता है.

क्या ये सिर्फ एक चिकित्सा सेवा का सवाल है – यानि की सिर्फ अलग अलग लोगों को एक बीमारी से कैसे बचाया जाए, मलेरिया या सर्दी खांसी के समान या फिर ये एक सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है? सार्वजनिक स्वास्थ्य से मेरा मतलब है राजय द्वारा पूरी आबादी के लिए स्वास्थ्य संबंधित सभी चीज़ों पर निगरानी और ज़रूरी पाबंदियों की व्यवस्था. मेरे ख्याल से शायद ही कोई हो जो इस बात से इंकार करे की ये एक सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है. इस हिसाब से हमारे देश की कैसी तैयारी है?

अस्पतालों में हर 1000 लोगों के लिए 1 से भी कम बिस्तर – क्यूबा में 5 से ऊपर और दुनिया का औसत 3. हर 1000 लोगों के लिए भारत में 0.8 डॉक्टर्स, क्यूबा में 8.2. हर 1000 लोगों के लिए भारत में 2.1 नर्स, क्यूबा 7.7. किस तरीके की नियंत्रण प्रणाली है हमारे देश में? सरकार निजी अस्पतालों में आपदा के वक़्त कुछ दिनों के लिए मुफ्त में जाँच भी ना करा सकी जबकि स्पेन ने कोरोना के चलते अपने सभी निजी हस्पतालों का राष्ट्रीयकरण कर दिया ताकि सबको मुफ्त और आसानी से इलाज मिल सके.

18 तारिक को कोटक महिंद्रा बैंक के मालिक ने दूसरे अरबपतियो से मीटिंग में कहा की बाजार में पैसे की कमी होने से नुक्सान होगा और 19 तारिक को आरबीआई ने Rs 10,000 करोड़ बाजार में डाल दिए. कौन किसको नियंत्रित करता है इस देश में ये शयद साफ़ है.

2018-2019 बजट में इंडिया ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय पर Rs 54,600 करोड़ खर्च करे और “सुरक्षा” – यानि सैन्यकरण पर Rs. 4,04,365 करोड़. शयद 3-4 नए लड़ाकू विमान से कोरोना को रोका जा सकता था?

सैन्यकरण को “सुरक्षा” बोला जाता है. जो 175 लोग जलवायु आपदा से हर महीने; हर घंटे काम पर 6 और पुलिस की बर्बरता से हर दिन 5 लोग मारे जाते हैं क्या ये उनकी सुरक्षा के लिए है? क्या इस देश के भूखे लोगों के लिए सुरक्षा परमाणु हतियार है या पेट में रोटी? जो राज्य देश में लोगों को डॉक्टर और बिस्तर ना मुहैया करा सके क्या उसको हतियारो पर करोड़ो रुपया बर्बाद करने का हक़ होना चाहिए?

परमाणु हत्यार से बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा शायद ही मानव इतिहास में कभी पैदा हुई हो. कोरोना वायरस से जूझने के लिए एक कमज़ोर प्रणाली ही सही, कुछ तो है हमारे पास. लेकिन एक परमाणु विस्फोट का नतीजा होगा एक शहर के एक बार में 150 हस्पताल 2मिनट में धूल हो जाना. महीनो के लिए बिजली गायब हो जाना – जिसके बिना जो हस्पताल चल सकते है उनमें भी काम ठप हो जाना. खाना और पानी जहर हो जाना, सड़को पे बिल्डिंग के मलबे से यातायात ठप हो जाना. कोरोना के लक्षण तो खांसी और सर्दी के है – जो गिने चुने लोगों को परमाणु विस्फोट के बाद हस्पताल लाया जा सकेगा उनके लक्षण होंगे उनके शरीर का गलना, और आसपास की हर चीज़ को रेडिएशन से जहरीला बना देना.

और ये तो उस समय की बात है जब बड़ी जंग नहीं होगी और कुछ ही परमाणु हतियारो का इस्तेमाल होगा. अगर भारी मात्रा में यह इस्तेमाल हुए तो वो मानव सभ्यता का अंत होगा. और यह कोई काल्पनिक बात नहीं है. आज भारत के पास 140 परमाडू हतियार है और 120 पाकिस्तान के पास. और नए और आसानी से इस्तेमाल किये जाने वाले हतियार और लॉन्चेर्स दोनों देश बना चुके है और कई बार तैनात भी कर चुके हैं. एक और तनाव की इस्थिति और एक और हिसाब में गलती की कीमत करोड़ों जान होगी.

ये है आज के भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य का हिसाब. कंपनियों के मुनाफा खोरी के कारन मुफ़्त में ईलाज नहीं हो सकता और ऐसे कानून नहीं बनाए जा सकते जिससे मजदूर काम पे सुरक्षित काम कर सकें और सब खुली हवा में सांस ले सकें. राज्य अपनी हुकूमत बनाए रखने के लिए मानव सभ्यता को रोज़ दाव पर लगा रहा है. लेकिन गलती कुछ हद तक हमारी है. अकेले घर में बैठ कर कोरोना से बचने के लिए हम सब राज़ी है लेकिन एकजुट होके सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए लड़ने को नहीं. लेकिन इसको बदला जा सकता है. हम अपनी सुविधा और डर के चलते जीवन को विलुप्त होने देंगे या फिर कोरोना के अनुभव से सीख कर असली सुरक्षा की लड़ाई में शामिल होंगे. विकल्प हमारे पास है – पर ज़ादा समय के लिए नहीं.

Resistance in Anchar, Kashmir

January 27th, 2020

TONS #4 – आतंकवादी कौन है?

January 12th, 2020

पूर्व नसऐ, शिवशंकर मेनन से आज मेने ये सवाल पूछा कि क्या मोदी शाशन में भारत द्वारा बॉर्डर पार कर मिलिट्री घुसपैठ और हमले में बढ़ोत्तरी हुई है?

उनके जवाब ने साफ़ कर दिया की भारतीय राज्य का हर हिस्सा राजय द्वारा किये जाने वाले आतंकवाद के पुरे समर्थन में है. मेनन का मानना है की बढ़ोत्तरी नहीं हुई है – हम पहले भी बालकोट जेसे हमले दूसरे देशों में करते रहे है.

“1950 से आजतक ऐसी एक भी बॉर्डर नहीं है जो हमने पार न की हो, अपनी हुकूमत बनाए रखने के लिए”

बस मोदी शाशन में में ये अंतर आया है कि ये अपनी पार्टी की राजनीती के चलते खुलासे करने लगी है – जिसका ये नतीजा है की सामने वाले देश को अपना नाम बचानेे के लिए लौट कर हमला करना पड़ता है, जिससे सुरक्षा और बात-चित पे बुरा असर पड़ता है.

हम्मे बीच बीच में इस तरह हमें जो लोग हमारे दुश्मन लगते है, उन्हें गोपनीय तरीके से मारते रहना चाहिए. कोई सबूत किसी कोर्ट में पेश करने की ज़रूरत नहीं, सामने वाले का पक्ष सुनने की ज़रूरत नहीं. हम कानून से ऊपर है.

राजनैतिक या धार्मिक गैर कानूनी हिंसा को ही शयद आतंकवाद बोला जाता है? वो ही हर राज्य की नीति होती है.

कुछ राजनेता इसे गोपनीय रखना चाहते है और बात-चीत को थोड़ा महत्व देते है. और आज की सरकार बस आतंकवाद इलेक्शन जीतने के लिए उजागर करती है.

राज्य क्या है?

December 28th, 2019

राज्य के लिए हमेशा उसका सबसे बड़ा दुश्मन उसके देश के लोग होते है. राज्य चाहता हे ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण समाज और इनसान के हर अंग पर, और लोगों को अमूमन ये हरकतें पसंद नहीं आती.

इसका हल अच्छी शिक्षा और मीडिया में मिला – ये लोगों को सिखा देते हे कि क्यो समाज मे गैर-बराबरी के बारे मे हम कुछ नहीं कर सकते और केसे राज्य लगों का गुलाम नहीं लोगों को राज्य की हर जरूरत पूरी करनी हे. राज्य जब बोले लाइन मे लगों, राज्य जब बोले बुके मरो और राज्य जब चाहे आपने घर और जमीन खाली करो.

और जब ये व्यवहार नियंत्रण के औजार काम ना आये तो राज्य अपना असल रूप दिखाने से नहीं झिझकता: वहशी जोर और हिंसा. नियंत्रण का सबसे साफ रूप.

आज पुलिस की हिंसा और उसको वाजिब करार देने वाले राष्ट्रीय झूठ को कई लोग पहचान रहे है.

कई लोग समझ रहे है की सरकार अपनी ताकत बनाए रखने के लिए डर पैदा कर हिंसा इस्तमाल करती है.

सवाल ये भी है की फिर जिस डर के आधार पे ये सरकार अरबो-खरबो रुप्पे फौजिकरण पे लगा रही है क्या वो भी ऐसे ही सरकारी झूठ के कारण है?

क्या पाकिस्तान असल में एक “दानव” हैं जिससे बात-चीत के माध्यम से कुछ हल नहीं निकाला जा सकता?

और अगर धर्म जाती के आधार पे लोगो को बांटना गलत है तो एक लकीर के किस पार पैदा हुए उसपे बाटना कितना सही हो सकता है?

बांग्लादेश में फिर फैक्ट्री में मजदूर मारे गए, पाकिस्तान में भी और दिल्ली में भी. सब देशों के मालिक वर्ग ने साथ में बेठ के वर्क-कंडिशंस पे नियम बनवाए है – IMF-WTO के साथ.

अगर सरकार मीडिया की मदद से लोगों के आँखों के सामने क्या हो रहा है उसको झुठला सकती है तो ये बंद कमरों में और दूर बॉर्डर पे या बस्तर और कश्मीर की सच्चाई और हिंसा पर कितना विश्वास किया जाना चाहिए?

“Kashmir crisis in sharp focus”: Crisis Group

December 27th, 2019

After years of being off radar of international conflict monitoring groups, Kashmir is ranked 8th in Crisis Group’s “10 Conflicts to Watch in 2020”; above Ukraine and just below US-North Korea conflict.

“After falling off the international radar for years, a flare-up between India and Pakistan in 2019 over the disputed region of Kashmir brought the crisis back into sharp focus. Both countries lay claim to the Himalayan territory, split by an informal boundary, known as the Line of Control, since the first Indian-Pakistani war of 1947-48.

First came a February suicide attack by Islamist militants against Indian paramilitaries in Kashmir. India retaliated by bombing an alleged militant camp in Pakistan, prompting a Pakistani strike in Indian-controlled Kashmir. Tensions spiked again in August when India revoked the state of Jammu and Kashmir’s semi-autonomous status, which had served as the foundation for its joining India 72 years ago, and brought it under New Delhi’s direct rule.

Prime Minister Narendra Modi’s government, emboldened by its May re-election, made the change in India’s only Muslim-majority state without any local consultation. Not only that: before announcing its decision, it brought in tens of thousands of extra troops, imposed a communications blackout, and arrested thousands of Kashmiris, including the entire political class, many of whom were not hostile to India.

These moves have exacerbated an already profound sentiment of alienation among Kashmiris that will likely further fuel a long-running separatist insurgency. Separately, the Indian government’s new citizenship law, widely regarded as anti-Muslim, has sparked protests and violent police responses in many parts of India. Together with the actions in Kashmir, these developments appear to confirm Modi’s intention to implement a Hindu nationalist agenda.

New Delhi’s claims that the situation is back to normal are misleading. Internet access remains cut off, soldiers deployed in August are still there, and all Kashmiri leaders remain in detention. Modi’s government seems to have no roadmap for what comes next.

Pakistan has tried to rally international support against what it calls India’s illegal decision on Kashmir’s status. But its cause is hardly helped by its long record of backing anti-India jihadis. Moreover, most Western powers see New Delhi as an important partner. They are unlikely to rock the boat over Kashmir, unless violence spirals.

The gravest danger is the risk that a militant attack sets off an escalation. In Kashmir, insurgents are lying low but still active. Indeed, India’s heavy-handed military operations in Kashmir over the past few years have inspired a new homegrown generation, whose ranks are likely to swell further after the latest repression. A strike on Indian forces almost certainly would precipitate Indian retaliation against Pakistan, regardless of whether Islamabad is complicit in the plan. In a worst-case scenario, the two nuclear-armed neighbours could stumble into war.

External actors should push for rapprochement before it is too late. That won’t be easy. Both sides are playing to domestic constituencies in no mood for compromise. Resuming bilateral dialogue, on hold since 2016, is essential and will necessitate concerted pressure, particularly from Western capitals. Any progress requires Pakistan taking credible action against jihadis operating from its soil, a non-negotiable precondition for India to even consider engaging. For its part, India should lift the communication blackout, release political prisoners, and urgently re-engage with Kashmiri leaders. Both sides should resume cross-border trade and travel for Kashmiris.

If a new crisis emerges, foreign powers will have to throw their full weight behind preserving peace on the disputed border”.

Anarchism, Pure and Simple

December 26th, 2019

Sixty four years ago a small periodical from Allahabad wrote:

“Now that India has obtained independence, the old combatant for liberty has given up his last gasp in the most complete poverty.”

Writing about the same “old combatant for liberty” Hem Day later recalled that ” he is not well known to all, even to our own people, for he has neither the fame of Gandhi, nor the fame of Nehru, nor the popularity of Vinoba, nor the notoriety of Kumarapa, nor the dignity of Tagore. He is Acharya, a revolutionary, an agitator, a writer.”

M.P.T. Acharya was born on 15th April 1887 in Chennai into a Bhramin family. From early years he was involved in the nationalist struggle. He edited a nationalist magazine for his uncle. When the periodical was suppressed by the colonial authorities Acharya had to escape to French controlled Pondicherry. Sensing he was not safe there he left India and landed in France. He soon moved to London and joined the Indian House with V.D Savarkar, Madan Lal Dhingra and other Indian nationalists. When in 1909 Dhingra assassinated Sir William Hutt Curzon Wyllie the Indian House soon disintegrated.

In next few years he visited Berlin, Munich and in November 1911 was in Constantinople to gain Muslim support against the British. In 1912 he moved to New York and in 1914 to San Fransisco, where he edited the Tamil edition of Gadar Party’s periodical. Gadar Party was set up a year ago, with help of his friend and IWW member Har Dayal. Har Dayal had spent time with Emma Goldman and when in 1914 Dayal was deported for being “an anarchist” Emma protested and wrote about it in Mother Earth.

It was during this time Acharya saw the real face of Western Democracies and stood against the notion of nation states. “Is it to make large cities with miserable people, barely eking their existence that we want to have ‘Swaraj’?” He asked.

”I consoled myself by answering that the misery was due to foreign Government, but under Indian Government, it would all vanish, because our countrymen will be friends of the poor when they come to rule. Late on, however, when i went to Europe and saw misery there, my illusions about “National” rule were shattered.”

Acharya spent the World War period in Middle East and in 1917, with Virendranath “Chatto” Chattopadhyaya, attended a socialist peace conference in Stockholm. Where he met prominent Bolshevik leaders and in 1919 met Lenin. In 1920 Acharya helped form and became Chairman of the Communist Party in exile, with M.N.Roy as Secratary. Acharya was kicked out in 1921 for his criticism of the direction CPI was taking under the Comintern and Roy’s autocratic behavior.

In 1922, with Rudolf Rocker, Augustin Souchy, Alexander Schapiro, Acharya was present at the founding meeting of the IWMA. Where he set up an Indian committee with an aim to send anarchist literature in India. Acharya’s involvement in international anarchist movement was set-off by his disillusionment with the USSR and the whole edifice of Marxist priesthood. He wrote:

“We are Anarchists, because we do not want authoritarianism outside or inside, because to us anti-Marxists, life and society must be, immanently – one indivisible whole impossible of mechanical separation – as the Marxists inorganically think and believe.” “Communism can come only through and beyond Anarchism not before and behind it, as Lenin predicted and died broken-hearted and mad.”

From 1923 onward, Acharya was in communication with Emma Goldman, Alexander Berkman, Taiji Yamaga, Lu Jianbo, Rudolf Rocker and many other anarchist, but most prominantly with Albert Meltzer – whom he met only twice but maintained a regular correspondence till his death. Acharya wrote for American, Russian, French, German, Spanish, British anarchist journals and newspapers on the topic of economics, India, anarchism among others.

When he returned to India in 1935, he also started writing for Indian publications, including Gandhi’s Harijan. About Gandhi, he wrote that “Gandhi is more opposed to the violence of the mass liberation than the violence of governments.” He admired Gandhi as a tactician and also independently formed his own “logical pacifism.” Acharya set up the Libertarian Socialist Institute and published many anarchist classics and new material in Bombay.

Acharya contrasting himself with the Indian communists wrote that “[w]hat is needed for the Indian proletariat is new workers’ organizations, of a revolutionary syndicalist character, which alone can tear it out of the misery in which it grows. Only federalist organizations, given their complete independence, can create a solid foundation for class struggle in India.”

Commenting on Acharya and Indian Left, Meltzer wrote that “it was impossible to comprehend the difficulty in standing out against the tide so completely as was necessary in a country like India. It was easy for former ‘nationalist revolutionaries’ to assert their claims to the positions left vacant by the old ‘imperialist oppressors.’ This Acharya would not do. He remained an uncompromising rebel, and when age prevented him from speaking, he continued writing right up to the time of his death.”

Acharya warned as early as 1945 that Nehru and Patel “goes around like emperor, and speak like emperor.” And that “[w]ithout an anarchist movement this country will go Fascist and go to the dogs.”

Penniless, sick and alone, this old combatant for liberty died in 1954. Albert Meltzer in Acharya’s obituary wrote:

“Despite all of his efforts Acharya remained an isolated Anarchist in India and failed to create a movement. Whilst nationalists like Har Dayal and Bhagat Singh had a knowledge of anarchist texts, they merely incorporated what they felt to be useful to the struggle against British rule into their thought. Nationalist, and to a lesser extent Communist Party orthodoxy, had too much of a grip on the Indian masses, and unlike elsewhere in Asia, an anarchist movement did not develop, much to the chagrin of Acharya”

“With a growing interest in anarchism among Indian students, a Bombay publishing house reprinted many classical Anarchist works, but Acharya did not succeed in building a movement before his death, nor do I think one exists yet.”

‘What is Anarchism?’ first appeared in Withering India edited by Iqbal Singh and Raja Rao in 1948. Most of the texts in the volume were written exclusively for it and other author included Nehru, Jinha, J.P. Narayan. ‘How Long Can Capitalism Survive?’ was published in The World Scene From Libertarian Point Of View by the Free Society Group of Chicago in 1951. In 2018, it is sad to note that all the aspect of capitalism that Acharya pointed to while predicting its’ end, in this essay, have given it the strength by which it today stands: financialization, international trade deficits, and institutions. In fact in this essay, which was written just three years before his death and when he was very ill, Acharya made many errors which he had criticized Marxists of in earlier writing and it is not a consistent libertarian text. For example, attempting to find almost a form of wage-centric-determinism in capitalism and calling anarchist economics “scientific” are not very appropriate from Acharya’s own earlier views. Claims such as “outside economic freedom there can be no freedom” are very anti-libertarian, if meant literally.

Some words that might cause confusion have been updated to current usage, while others that are still understandable are kept as they were. Writing in 1940s Acharya was using non-gender-neutral terms while talking about the species as a whole. Comments in square brackets are by me.

I would like to thank Ole Birk Laursen and other scholars who have helped dig up and bring back to light MPT Acharya’s life and ideas. A collection of Acharya’s works will be published by AK Press in 2019, thanks to Mr. Laursen.

The Fraternity of the Red Flag

December 26th, 2019

 

The Fraternity of the Red Flag was a revolutionary organization established in California around 1912. Har Dayal, an anarchist, Secretary of the Oakland IWW branch and Indian expatriate, founder of the Ghardar Party, which militantly opposed British colonization of India. The fraternity ran the “Bakunin Institute,” an anarchist “monastery” in Oakland based on the ideas of the Spanish educator Fransisco Ferrer. Any radical over twenty years of age could join the Fraternity. A prospective member would spend a year of “moral and intellectual preparation” under the guidance of an existing member, and then pledge to uphold “the eight principles of Radicalism”, including:
4. The establishment of communism, and the abolition of private property in land and capital through industrial organization and the General Strike.
5. The establishment of free, fraternal cooperation, and the ultimate abolition of the coercive organization of Government.
6. The promotion of science and sociology, and the abolition of religion and metaphysics.
7. The establishment of Universal Brotherhood, and the abolition of patriotism and race feeling.
8. The establishment of the complete economic, moral, intellectual and sexual freedom of women, and the abolition of prostitution, marriage, and other institutes based on the enslavement of women.

TONS #3 – Who is a terrorist?

November 10th, 2019

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Day 98 of the continued brutal crackdown and in its response mass civil-disobedience, strikes in Indian occupied Kashmir.  Graphic novelist Malik Sajad’s Op-Art has been published by the New York Times.

Bulletin of the Atomic Scientists last week published an article by nuclear experts, including Alan Robock and Hans Kristensen that presents one of the many possible nuclear exchange scenarios in the near future when “each country will possess about 250 nuclear weapons. In the end, Pakistan will use all its weapons, while India will reserve 100 of them to defend against future attacks from China.”

They predict close to 10 crore deaths within weeks and”a nuclear winter would halt agriculture around the world and produce famine for billions of people… Also, ozone would be destroyed as the rising smoke absorbs sunlight and heats the stratosphere, allowing more ultraviolet light to reach the ground and creating negative effects that we have yet to study.”

On the legitimacy of nuclear weapons and deterrence, they write that “the existence of enormous arsenals of nuclear weapons during this time has not prevented terrorism or countless regional, territorial, and politically motivated military actions, taking in aggregate a terrible human toll. It would be foolhardy, of course, to suggest that an effective way to stop warfare would be to arm all nations with nuclear weapons as local deterrents. Contrarily, we understand, in the 21st century, that establishing mechanisms for conflict negotiation and resolution on a global international basis is the only safe and practical way to end the carnage. We are not Pollyannas. But it should be the mission of every concerned citizen, particularly those in positions of influence, to work toward the abolition of nuclear weapons, within the context of global peace and security mechanisms”

The threat of nuclear weapons (besides, only, climate breakdown) poses the question of cosmic significance: will organized life survive? No terrorist organization or armed insurgency comes anywhere close to posing such a threat.

Nissim Mannathukkaren in The Hindu writes that, “an analysis done by political satirist Ramit Verma showed that of the 202 popular prime-time news debates across four major Hindi channels till October 19, at least 79 were about attacking Pakistan; 66 about attacking the Opposition; 36 about praising the Prime Minister and the ruling party; and 14 about Ram Mandir. There was not a single debate on the economy, unemployment, education, health, gender, farmers or the environment. This is simply staggering by any measure.” He could have added the menacing nuclear threat to the list.

Mannathukkaren also points out that “in 2018, terrorism/militancy killed 400 civilians and security personnel. Compare this to the fact that 1,02,677 children (under five) died from easily preventable diarrhoeal diseases in 2017, or that 8,75,659 children (under five) were killed by communicable, neonatal and nutritional diseases. Or consider that while the number of terrorism/militancy-related deaths have come down substantially to around 500 from 2011 onwards, the burden of deaths from diseases like cardiovascular ones has drastically increased from about 13 lakh in 1990 to 26.32 lakh in 2017.”

Yet in the 2018-2019 Union Budget of India, we spent Rs 1,14,915 crore on Rural Development, Rs 41,765 crore on Housing and Urban Affairs, Rs 54,600 crore on Ministry of Health and Family Welfare, Rs 71,000 crore on Road Transport and Highways, Rs 22,357 crore on Ministry of Drinking Water and Sanitation, Rs 85,010 crore on Human Resource Development.

While we spent Rs 4,04,365 crore on “defense”.

The monster that is the Indian state is swallowing up its own population for the health of the war machine, with 10 crore life under its fingers, it is one of the biggest terrorist organization in world history. Kashmiris are bravely resisting and fighting this mammoth.